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आख़िरी इक सवाल, इश्क़ से थोड़ा आगे, फ़लसफ़ा-ए-मोहब्बत

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प्यार मुझसे किया जो, तुम निभा पाओगी क्या? मैं अगर कम पड़ गया, फिर भी चाह पाओगी क्या? कमियाँ बहुत हैं मुझमें, यह वक़्त बताएगा तुम्हें, उन्हें देखकर भी तुम, मुझको ही चाहोगी क्या? तुम चंचल नदी-सी हो, मैं ठहरे झील-सा, मेरी इन ख़ामोशियों से, कहीं ऊब जाओगी क्या? गर मुक़द्दर ने हमें, एक-दूजे से दूर किया, तो भी इस इश्क़ पे, क़ायम रह पाओगी क्या? इक आख़िरी सवाल है, इश्क़ से थोड़ा आगे, मेरी सबसे अच्छी दोस्त, तुम बन पाओगी क्या?

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