न रूह मिले ना तन मिले, फिर कैसा वो प्यार

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सब धरती को कागज़ करूँ, लेखनी हो बनराय सात समुंदर मसि करूँ, प्रेम लिखा न जाय न रूह मिले ना तन मिले, फिर कैसा वो प्यार रूह बिन तन है प्राणहीन, हाड़-माँस का जाल प्रेम खातिर दे दे जान, यह बहुत आसान है सुख-दुख में जो साथ निभाए, वो सच्चा है प्यार रंग-रूप, ज़ात-लिंग, ऊँच-नीच, ना कोई भेद प्यार वो भावना जो दूर करे समाज के भेदभाव आवेग में एक दिल हेतु, कितने तोड़े तू दिल माँ-बाप का घर छोड़ना, क्या सच्चा है प्यार दो तन बस संग घूमना, वो होता नहीं प्यार एक दूजे की रूह में बसना, सच्चा वो प्यार

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