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ज़िंदगी कहाँ इतनी आसान

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अब रुक सा जाता हूँ, कुछ करने से पहले, सोचने लगता हूँ, कुछ कहने से पहले। ठोकरें खाकर अब, संभलने लगा हूँ मैं, चार दिन की ज़िंदगी, कहाँ इतनी आसान! तलाशता हूँ खामोशी, शहर के मकानों में, गुज़री थी उम्र मेरी, आम की छाँव में। मुद्दतें हुईं शहर से, चाँद को भी गुज़रे, शहर की ये ज़िंदगी, कहाँ इतनी आसान! घूमना मैं चाहता हूँ, अजनबी शहर में, डूबना मैं चाहता हूँ, वक़्त की लहर में। जिस्म ढल जाएगा जब, हो जाएगा बेजान, रूह चलती ही रहेगी, सफ़र कहाँ है आसान!

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