कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
By Anjum Rehbar
कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं। वो बेवफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं। समझाया बारहा कि बचो प्यार-व्यार से लेकिन कोई सहेली कहा मानती नहीं। मैंने तुझे मुआफ़ किया जा कहीं भी जा मैं बुज़दिलों पे अपनी कमान तानती नहीं। अंजुम’ पे हँस रहा है तो हँसता रहे जहाँ मैं बेवक़ूफ़ियों का बुरा मानती नहीं।।