अंजुम रहबर जी के कुछ बेहद लोकप्रिय और बेहतरीन मुक्तक
यह किसी धाम का नहीं होता, यह किसी नाम का नहीं होता। प्यार में जब तलक नहीं टूटे, दिल किसी काम का नहीं होता। _____________________ मजबूरियों के नाम पर सब छोड़ना पड़ा, दिल तोड़ना कठिन था मगर तोड़ना पड़ा। मेरी पसंद और थी सब की पसंद और, इतनी ज़रा सी बात पर घर छोड़ना पड़ा। _____________________ इतने करीब आ के सदा दे गया मुझे, मैं बुझ रही थी कोई हवा दे गया मुझे। मांगा था मैंने ज़हर, दवा दे गया मुझे, उसने भी खाक डाल दी अंजुम की कब्र पर, वो भी मोहब्बत का सिला दे गया मुझे। _____________________ खामोश हैं लब, चुप है नज़र, याद नहीं है, कुछ आपसे कहना है मगर याद नहीं है। अब वो मेरी तस्वीर का दीवाना बना है, कहता था मुझे कोई हुनर याद नहीं है। _____________________ होंठों की भी क्या मजबूरी रहती है, सब कुछ कहकर बात अधूरी रहती है। उससे मिलकर अंजुम ये एहसास हुआ, कुर्बत में भी कितनी दूरी रहती है।