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हिमालय

By Ramdhari Singh 'Dinkar'

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार दिव्य गौरव विराट, पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त, युग-युग गर्वोन्नत नित महान, निस्सीम व्योम में सुवितान, युग-युग से किस गरिमा में व्यक्त? कैसा अखंड यह चिर-समाधि? यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान? तू महाशून्य में खोज रहा, किस जटिल समस्या का निदान? उलझन का कैसा विषम जाल? मेरे नगपति! मेरे विशाल! ओ मौन तपस्वी! खोल आँख, उपट के देख पद-तल रेणु, जल रहा स्वर्ण-युग का कपाल, साये में तेरे पावन के, हम कहाँ खो गये हैं कराल? तू थके हुए! मत सो अभी, जागृत हो, उठ रे अभय भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल!

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